सीबीएसई त्रि-भाषा नीति: सुप्रीम कोर्ट ने कहा ‘छात्रों पर बेवजह दबाव की होगी जांच’ | NEP 2020 का असर?

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई (CBSE) की कक्षा 9वीं में त्रि-भाषा नीति (Three-Language Policy) लागू करने के फैसले पर अहम सुनवाई की है। 27 मई को हुई इस सुनवाई में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस नीति की जांच की जाएगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इससे छात्रों और संसाधनों पर अनावश्यक दबाव न पड़े। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पूरे देश के शिक्षाविदों, अभिभावकों और छात्रों के बीच भाषा नीति को लेकर गहन चर्चा चल रही है।

त्रि-भाषा नीति: सुप्रीम कोर्ट की मुख्य चिंताएं

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन-जजों की बेंच ने सीबीएसई और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) से इस मुद्दे पर जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि इस नीति को लागू करने में आने वाली व्यावहारिक और व्यवस्थागत कठिनाइयों को समझना महत्वपूर्ण है, खासकर शिक्षकों और अध्ययन सामग्री की कमी को देखते हुए। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अगली सुनवाई 1 जुलाई को करेगा।

कक्षा 9वीं में त्रि-भाषा नीति: क्या है नियम?

सीबीएसई ने वर्तमान सत्र से कक्षा 9वीं के लिए त्रि-भाषा फॉर्मूला लागू करने का निर्णय लिया है। इसके लिए 15 मई को एक सर्कुलर जारी किया गया था, जिसके अनुसार यह नियम 1 जुलाई से प्रभावी होना है। छात्रों को तीसरी भाषा चुनने के लिए 31 मई तक का समय दिया गया था। इस नीति के तहत, छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होनी अनिवार्य हैं। यह नियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) और स्कूल शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 का हिस्सा है।

याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां और आरोप

सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति को सुप्रीम कोर्ट में छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों सहित 19 लोगों के एक समूह ने चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह फैसला सीबीएसई के पिछले बयान से विरोधाभासी है, जिसमें कहा गया था कि तीसरी भाषा का नियम (R3) 2029-30 सत्र तक कक्षा 9वीं के छात्रों पर लागू नहीं होगा।

  • बुनियादी ढांचे की कमी: अभिभावकों और शिक्षकों का कहना है कि प्रशिक्षित शिक्षकों और पाठ्यपुस्तकों की कमी के बावजूद स्कूलों पर इसे लागू करने का दबाव डाला जा रहा है।
  • मनमाना फैसला: याचिकाकर्ताओं ने सीबीएसई और एनसीईआरटी पर इस फैसले को मनमाना बताया है।
  • NEP 2020 की भावना के खिलाफ: यह सर्कुलर नई शिक्षा नीति 2020 की भावना के विरुद्ध माना जा रहा है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि किसी भी राज्य या छात्र पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी।

इस फैसले से कक्षा 9वीं और 10वीं के लगभग 50 लाख बच्चे प्रभावित होने का अनुमान है।

सीबीएसई का रुख और स्पष्टीकरण

बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि कक्षा 10वीं में तीसरी भाषा के लिए कोई बोर्ड परीक्षा नहीं होगी। सर्कुलर में कहा गया है कि तीसरी भाषा का पूरा मूल्यांकन स्कूल स्तर पर और आंतरिक रूप से किया जाएगा, और छात्रों के प्रदर्शन को सीबीएसई प्रमाण पत्र में दर्ज किया जाएगा। हालांकि, यह भी कहा गया है कि जब तक छात्र इस पेपर में पास नहीं होते, तब तक उन्हें कक्षा 10वीं का प्रमाण पत्र नहीं मिलेगा।

सीबीएसई ने भारतीय भाषाओं के लिए योग्य शिक्षकों की कमी को स्वीकार किया है और स्कूलों को हाइब्रिड शिक्षण सहायता, सेवानिवृत्त भाषा शिक्षकों की नियुक्ति और योग्य स्नातकोत्तर शिक्षकों को नियुक्त करने की अनुमति दी है। बोर्ड कक्षा 6वीं के लिए 19 भाषाओं में किताबें तैयार कर रहा है, और नई किताबें उपलब्ध होने तक 9वीं कक्षा के छात्रों को 6वीं कक्षा की किताबों से पढ़ाई करनी होगी।

नई शिक्षा नीति 2020 और भाषा शिक्षा

नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) को 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दी गई थी, जो भारत की शिक्षा नीति में 34 साल बाद एक बड़ा बदलाव है। इसका उद्देश्य भारत की शिक्षा प्रणाली को 21वीं सदी की जरूरतों के अनुरूप ढालना है। हालांकि, शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय होने के कारण, राज्य और केंद्र सरकार दोनों का अधिकार होता है। NEP में किसी भी राज्य या छात्र पर कोई भाषा नहीं थोपने की बात कही गई है, जिसे लेकर वर्तमान नीति पर सवाल उठ रहे हैं।

आगे क्या? अगली सुनवाई और संभावित प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर सोमवार को सुनवाई कर सकता है। इस निर्णय का भविष्य भारतीय शिक्षा प्रणाली और छात्रों के लिए महत्वपूर्ण होगा। यह देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट छात्रों के हित, संसाधनों की उपलब्धता और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करता है।

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