आईपीएस ट्रेनिंग और मातृत्व: क्या गर्भावस्था बन सकती है करियर में बाधा? सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाई।

भारतीय सिविल सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के साथ, विभिन्न नियमों और नीतियों पर फिर से विचार करना आवश्यक हो गया है, खासकर जब बात मातृत्व और करियर की हो। हाल ही में, मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है, जिसने गर्भावस्था के दौरान आईपीएस प्रशिक्षण से संबंधित पुराने नियमों पर एक अहम बहस छेड़ दी है।

आईपीएस उर्वशी सेंगर का मामला: क्या है विवाद?

आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर ने अपनी परिवीक्षा अवधि के दौरान गर्भवती होने के बाद अपनी ट्रेनिंग जारी रखने की अनुमति न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। मौजूदा आईपीएस प्रशिक्षण नियमों के अनुसार, गर्भावस्था की स्थिति में महिला अधिकारी को अपने मूल बैच के साथ प्रशिक्षण छोड़ना पड़ता है और बच्चे के जन्म के बाद किसी दूसरे बैच में शामिल होना पड़ता है। इसके अलावा, गर्भवती अधिकारियों को घुड़सवारी, लंबी दूरी की दौड़ और युद्ध प्रशिक्षण जैसी शारीरिक रूप से कठिन गतिविधियों से छूट दी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल: क्या मातृत्व बाधा है?

इस मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय के 1993 के उस ऑफिस मेमोरेंडम (OM) के पीछे के तर्क पर गंभीर सवाल उठाए जो गर्भवती महिला आईपीएस परिवीक्षाधीनों को बच्चे के जन्म के एक साल बाद तक प्रशिक्षण में शामिल होने से रोकता है, भले ही वे चिकित्सकीय रूप से फिट क्यों न हों। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने केंद्र सरकार से पूछा कि यदि कोई महिला अधिकारी डिलीवरी के बाद चिकित्सकीय रूप से फिट घोषित हो जाती है और प्रशिक्षण लेने की इच्छुक है, तो उसे अपनी परिवीक्षा अवधि पूरी करने से क्यों रोका जाना चाहिए। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि क्या मातृत्व किसी अधिकारी की करियर प्रगति में बाधा बन जाना चाहिए, खासकर तब जब प्रशिक्षण फिर से शुरू करने में कोई मेडिकल समस्या न हो।

1993 के पुराने नियम को चुनौती क्यों?

याचिका में 1993 के इस नियम को चुनौती दी गई है, जिसमें तर्क दिया गया है कि ऐसे निर्णय पुराने नियमों के बजाय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर होने चाहिए। यह नियम सभी गर्भवती अधिकारियों पर समान रूप से लागू होता है और इसमें प्रशिक्षण के फेज-1 (जो अधिक शारीरिक होता है) और फेज-2 (जो मुख्य रूप से कक्षा आधारित और अकादमिक होता है) के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता का मानना है कि फेज-2 में, जो शारीरिक रूप से कम कठिन होता है, केवल गर्भावस्था के आधार पर बाहर करना ठीक नहीं है।

IAS और IPS के नियमों में असमानता

यहां एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि साल 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने महिला आईएएस अधिकारियों के लिए इस पुराने नियम में बदलाव कर दिया था। इसके तहत अब आईएएस महिला प्रोबेशनरों को मेडिकल फिटनेस के आधार पर ट्रेनिंग पूरी करने की इजाजत मिलती है। ऐसे में, आईपीएस अधिकारियों के लिए 1993 का पुराना नियम लागू रखना समानता के सिद्धांत के खिलाफ प्रतीत होता है, और यह एक ही सिविल सेवा के तहत विभिन्न सेवाओं के बीच असमानता पैदा करता है।

सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान फैसला और आगे की राह

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उर्वशी सेंगर को फिलहाल चल रही ट्रेनिंग में तुरंत शामिल करने का आदेश देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 9 हफ्तों में से तीन हफ्ते की ट्रेनिंग पहले ही हो चुकी है, जिससे यह संभावना कम है कि वह शेष ट्रेनिंग को प्रभावी ढंग से पूरा कर पाएंगी। अदालत ने केंद्र सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया कि इससे महिला आईपीएस की सीनियरिटी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) महिला आईपीएस की मूल याचिका पर मेरिट के आधार पर सुनवाई करे। यह निर्णय इस बात पर प्रकाश डालता है कि ऐसे मामलों में व्यक्तिगत परिस्थितियों और नियमों की वैधता पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है, ताकि महिला अधिकारियों के अधिकारों और करियर प्रगति को सुरक्षित रखा जा सके।

Scroll to Top