नीति आयोग रिपोर्ट: भारत में ग्रेजुएट्स को नौकरी क्यों नहीं मिल रही? | शिक्षा और रोजगार का अंतर
भारत में हर साल लाखों छात्र ग्रेजुएट होकर निकलते हैं, लेकिन क्या यह शिक्षा उन्हें नौकरी दिला पा रही है? नीति आयोग की एक नई रिपोर्ट ‘Reimagining Skilling for Viksit Bharat @2047’ ने इस सवाल पर गंभीर चिंता जताई है। यह रिपोर्ट बताती है कि देश में ग्रेजुएशन के बल पर रोजगार देने की दिशा में अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं।
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सिर्फ 8.25% ग्रेजुएट्स को ही रोजगार मिल पाता है। यह आंकड़ा उन करोड़ों युवाओं के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करता है जो अपनी डिग्री पाने में सालों की मेहनत और पैसा लगाते हैं, लेकिन नौकरी की राह में संघर्ष करते रहते हैं।
शिक्षा और उद्योग की बदलती ज़रूरतें: कहाँ है अंतर?
नीति आयोग की रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि भारत की उच्च और तकनीकी शिक्षा प्रणाली में जो पढ़ाया जाता है, उसमें और लेबर मार्केट की वास्तविक ज़रूरतों के बीच एक बड़ा अंतर है। कई शिक्षण संस्थानों में आज भी पुराने सिलेबस पढ़ाए जा रहे हैं, जो तेज़ी से बदलती इंडस्ट्री की मांगों के हिसाब से नहीं हैं। इसी वजह से डिग्री, डिप्लोमा या सर्टिफिकेट होने के बावजूद युवाओं को आसानी से नौकरी नहीं मिल पाती।
डिग्री है, पर स्किल नहीं: नौकरी क्यों नहीं मिलती?
आजकल की सच्चाई यह है कि केवल बीए, बीकॉम या बीएससी जैसी पारंपरिक डिग्री के आधार पर नौकरी मिलना मुश्किल हो गया है। हालांकि कई छात्र इन डिग्रियों को सरकारी नौकरियों के लिए पात्रता हासिल करने के लिए भी लेते हैं, लेकिन समस्या यह है कि ये डिग्रियां अक्सर यह नहीं बता पातीं कि ग्रेजुएट वास्तव में क्या काम कर सकता है।
नीति आयोग ने साफ कहा है कि इन डिग्रियों को पूरा करने पर शायद ही कभी सीधे नौकरी मिलती है। आज एंट्री-लेवल की नौकरियों के लिए भी टैली (Tally) या ऑफिस एप्लिकेशन जैसे व्यावहारिक स्किल्स (Practical Skills) की जरूरत होती है।
छात्रों का दृष्टिकोण: 34% को स्किल्स की कमी महसूस होती है
रिपोर्ट में उजागर किया गया अंतर सिर्फ रोजगार के आंकड़ों में ही नहीं, बल्कि खुद छात्रों की बातों में भी झलकता है। 34% छात्रों को लगता है कि उनमें नौकरी के लिए ज़रूरी स्किल्स की कमी है। यह दर्शाता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की मुख्य कमजोरी कहां है – यह छात्रों की सफलता को केवल एनरोलमेंट, परीक्षा और डिग्री के आधार पर मापती रही है, न कि इस बात पर कि क्लासरूम से निकलने के बाद छात्र क्या करने में सक्षम हैं।
- एक इकोनॉमिक्स ग्रेजुएट थ्योरी तो जानता है, लेकिन कंपनी के फाइनेंस में इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है, यह उसे नहीं मालूम।
- एक कॉमर्स ग्रेजुएट अकाउंट्स की पढ़ाई करता है, लेकिन वर्कप्लेस पर काम आने वाले सॉफ्टवेयर स्किल्स के बारे में उसे जानकारी नहीं होती।
- इसी तरह, पॉलिटिकल साइंस का ग्रेजुएट छात्र पॉलिटिकल थ्योरी समझता है, लेकिन उसके पास रिसर्च की प्रैक्टिकल ट्रेनिंग या पॉलिसी एनालिसिस का ज्ञान नहीं होता।
संक्षेप में कहें तो, कॉलेज से मिले सर्टिफिकेट अक्सर काम करने की वास्तविक क्षमता को नहीं दर्शाते।
कॉलेज और जॉब मार्केट के बीच की ‘गायब कड़ी’
नीति आयोग का यह पेपर ‘कमजोर प्रैक्टिकल लर्निंग, इंडस्ट्री का अपर्याप्त अनुभव और नौकरी के लिए ज़रूरी तैयारी में पूरी मदद न मिल पाने’ जैसी कमियों की पहचान करता है। हाईस्कूल के बाद मिलने वाली औपचारिक शिक्षा में CV राइटिंग, मॉक इंटरव्यू और जॉब सर्च के लिए सपोर्ट की कमी होती है। ऐसे में स्टूडेंट्स अपनी काबिलियत को जाने बिना ही जॉब मार्केट में पहुंच जाते हैं।
इसके अलावा, फैकल्टी के पास पर्याप्त इंडस्ट्री अनुभव न होना और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण छात्रों को केवल सतही या पुरानी प्रैक्टिकल जानकारी मिल पाना भी एक बड़ी समस्या है। एम्प्लॉयर अनुभवी ग्रेजुएट्स चाहते हैं, लेकिन ग्रेजुएट्स के पास अनुभव की कमी होती है, जिसके चलते कॉलेज से निकलने के बाद भी वे वर्कप्लेस से जुड़ नहीं पाते। यह एक दुष्चक्र बन जाता है।
समाधान क्या है? इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप की भूमिका
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप इस कमी को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण ज़रिया बन सकती हैं। हालांकि, यह चेतावनी भी दी गई है कि अगर छात्र केवल ऑब्जर्व करते हैं और वास्तविक रूप से सीखते या काम नहीं करते, तो उनका ज्ञान सतही ही बनकर रह जाता है। इन अवसरों को प्रभावी बनाने के लिए उन्हें वास्तविक सीखने और कौशल विकास पर केंद्रित होना चाहिए।
भारत के सामने अब सिर्फ युवाओं को कॉलेज में एडमिशन दिलाने की चुनौती नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी चुनौती उस सवाल का जवाब देने की है जो डिग्री मिलने के बाद सामने आता है: “अब क्या?”। शिक्षा प्रणाली को इस दिशा में बदलना होगा ताकि वह युवाओं को ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए तैयार कर सके।
नीति आयोग क्या है?
नीति आयोग (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) भारत सरकार का प्रमुख नीति-निर्माण और सलाहकारी संस्थान है। इसकी स्थापना 1 जनवरी 2015 को हुई थी। इसका मुख्य काम सरकार को नीतिगत सलाह देना, लंबी अवधि की योजनाएं बनाना, राज्यों के साथ मिलकर काम करना, और सरकारी योजनाओं की निगरानी व मूल्यांकन करना है।