NEET के दबाव से जूझते छात्र: आत्महत्याओं की बढ़ती संख्या और बचाव के उपाय
भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं, खासकर NEET जैसी प्रवेश परीक्षाओं का दबाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहा है। हाल के दिनों में NEET से जुड़ी निराशा के कारण कई छात्रों ने अपनी जान ले ली है, जिसने पूरे देश को चिंतित कर दिया है। यह सिर्फ एक परीक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि एक जटिल सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्या है जिस पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।
एक दर्दनाक हकीकत: बढ़ती छात्र आत्महत्याएं
तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में 21 वर्षीय मेडिकल छात्रा श्रुति लया का मामला इसी दुखद वास्तविकता का एक उदाहरण है। NEET-UG काउंसलिंग के पहले राउंड में सीट न मिलने से निराश होकर उसने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। पिछले साल भी उसे सीट नहीं मिल पाई थी, और इस साल परीक्षा पास करने के बावजूद काउंसलिंग में नाम न आने से वह टूट गई। यह अकेली घटना नहीं है; NEET पेपर लीक विवाद के बाद से आत्महत्या करने वाले छात्रों का आंकड़ा 23 तक पहुँच चुका है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, उस साल 13,892 छात्रों ने आत्महत्या की, जो पिछले दस सालों में सबसे अधिक संख्या है। इन आत्महत्याओं में से 8.1% छात्रों से संबंधित थीं।
सपनों का टूटना: कुछ और दर्दनाक कहानियां
- दिल्ली की अंशिका: आजाद नगर की रहने वाली अंशिका पांडे ने डॉक्टर बनने का सपना देखा था। उसने अपनी डायरी में लिख रखा था, ‘मैं NEET निकाल चुकी हूं। MBBS कर रही हूं।’ NEET रद्द होने की खबर ने उसे तोड़ दिया और उसने 14 मई को आत्महत्या कर ली। उसका परिवार एक छोटे से कमरे में रहता है, और पिता इंद्रधर पांडे के अनुसार, यह उसका तीसरा प्रयास था और उसे सफल होने का पूरा भरोसा था।
- अहमदाबाद के काहान: 17 वर्षीय काहान पटेल NEET परीक्षा देकर बहुत खुश लौटा था, उसे पूरा यकीन था कि इस बार उसका सपना पूरा हो जाएगा। उसने अपनी सारी किताबें जूनियर्स को दे दी थीं। लेकिन परीक्षा से जुड़ी अनिश्चितताओं ने उसे इतना प्रभावित किया कि उसने अपनी जान ले ली। परिवार में कोई साइंस बैकग्राउंड से न होने के बावजूद उसने डॉक्टर बनने का सपना देखा था।
- हरियाणा की सिमरन: हिसार की सिमरन, जिसने BSc एग्रीकल्चर में एडमिशन लिया था और कई अन्य परीक्षाएं भी पास की थीं, का एकमात्र लक्ष्य MBBS करना था। 21 जून को परिवार के साथ खाना खाने के कुछ ही देर बाद उसने कीटनाशक खाकर आत्महत्या कर ली। उसके पिता रोहतास कुमार का कहना है कि पेपर लीक ने सिर्फ उनकी बेटी का नहीं, बल्कि पूरे परिवार का सपना छीन लिया।
विशेषज्ञ की राय: क्या है छात्र आत्महत्याओं का कारण?
MP सुसाइड प्रिवेंशन टास्क फोर्स के सदस्य और साइकैट्रिस्ट डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के अनुसार, किसी भी आत्महत्या का कोई एक कारण नहीं होता। यह जेनेटिक कारणों, सामाजिक दबाव, साथियों के दबाव (पियर प्रेशर), माता-पिता की अपेक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था सहित कई कारकों का मिला-जुला परिणाम होता है। डॉ. त्रिवेदी बताते हैं कि:
- हम बच्चों को तनाव, अस्वीकृति या असफलता से निपटना सिखाने में असफल रहते हैं।
- आज बच्चा यह मानने लगा है कि उसकी अकादमिक उपलब्धि उसके अस्तित्व से भी बड़ी है।
- समाज ने प्रतियोगी परीक्षाओं को बहुत अधिक महिमामंडित कर दिया है, जिससे बच्चा महसूस करता है कि वह तभी ‘पूर्ण’ होगा जब कोई परीक्षा क्रैक कर लेगा।
- जब 14-16 लाख छात्र परीक्षा देते हैं और सीटें सिर्फ कुछ हज़ार होती हैं, तो असफलता का सामना करने वाले बच्चों की संख्या अधिक होना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें इस असफलता से निपटने के लिए तैयार नहीं किया जाता।
- सिर्फ मोटिवेशनल लेक्चर या काउंसलर लगा देने से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर काम करने की जरूरत है।
बर्थर इफेक्ट (Copycat Suicide) और मीडिया की भूमिका
डॉ. त्रिवेदी लगातार हो रही आत्महत्याओं के पीछे बर्थर इफेक्ट (यानी कॉपीकैट सुसाइड) को भी एक वजह बताते हैं। इसमें किसी विशेष कारण से हुई आत्महत्या को जब महिमामंडित किया जाता है, तो उसी स्थिति से जूझ रहे अन्य लोग भी प्रभावित होकर आत्महत्या कर सकते हैं। इसलिए, आत्महत्या की खबरों का प्रचार-प्रसार बहुत संवेदनशीलता के साथ होना चाहिए। खबरों में ‘पढ़ाई के दबाव में गई जान’ जैसे शीर्षक से बच्चों को यह लग सकता है कि यह एक ‘अच्छा बचाव’ है, जिससे उनमें आत्महत्या के विचार आ सकते हैं।
क्या है समाधान?
इस गंभीर मुद्दे का समाधान सिर्फ काउंसलिंग या कुछ हेल्पलाइन नंबर देने से नहीं होगा, बल्कि इसके लिए शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक सोच और पारिवारिक सहयोग में बड़े बदलाव लाने होंगे। बच्चों को सफलता के साथ-साथ असफलता को भी स्वीकार करना सिखाना होगा। उन्हें समझना होगा कि एक परीक्षा उनका अंतिम पड़ाव नहीं है और जीवन में अवसर हमेशा मिलते रहते हैं।
मदद के लिए संपर्क करें (Important Helpline)
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