मलेरिया की दवा बनी जानलेवा: आंध्र प्रदेश में मासूम बच्ची की मौत, 50 से अधिक बीमार
आंध्र प्रदेश के पोलावरम जिले के गोल्लागुप्पा गांव से एक बेहद दुखद घटना सामने आई है, जिसने दवा वितरण और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 2 सितंबर को मलेरिया से बचाव के लिए बांटी गई क्लोरोक्वीन (Chloroquine) की गोलियां खाने के बाद एक 7 साल की बच्ची की मौत हो गई, जबकि 50 से अधिक लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
क्या था पूरा मामला?
चिंतूर के सहायक आदिवासी कल्याण अधिकारी तुलसी दास के अनुसार, गोल्लागुप्पा गांव में मलेरिया के मामले सामने आने के बाद सुरक्षा के तौर पर दवा वितरण का फैसला लिया गया था। मंगलवार दोपहर करीब 3:30 बजे, गांव के एक प्राथमिक विद्यालय में 71 छात्रों को क्लोरोक्वीन की गोलियां दी गईं। जिला जनसंपर्क विभाग के मुताबिक, लक्ष्मीपुरम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) से जुड़े इस गांव में मंगलवार तक कम से कम 6 मलेरिया पॉजिटिव मामले दर्ज किए गए थे।
गोलियां खाने के बाद बिगड़ी तबीयत
दवा लेने के बाद, कई छात्र घर लौटते ही उल्टी और अन्य लक्षणों का अनुभव करने लगे। गांव का इलाका दूरस्थ होने के कारण एम्बुलेंस का पहुंचना मुश्किल था। ऐसे में, अभिभावकों ने अपने बच्चों को ट्रैक्टर और मोटरसाइकिल से बांदिरेवु जंक्शन तक पहुंचाया, जहां से उन्हें पहले लक्ष्मीपुरम PHC और बाद में बेहतर इलाज के लिए तेलंगाना के भद्राचलम एरिया अस्पताल भेजा गया।
7 साल की मडिवि जमुना की मौत
इस दुखद घटना की सबसे बड़ी शिकार बनीं दूसरी कक्षा की छात्रा, 7 वर्षीय मडिवि जमुना, जो कोया आदिवासी समुदाय से थीं। क्लोरोक्वीन की गोली खाने के बाद वह बेहोश हो गईं। चिकित्सकों के अनुसार, बच्ची की मौत संभवतः शुगर लो होने के कारण हुई, हालांकि मौत के सटीक कारणों की जांच अभी जारी है।
बड़े पैमाने पर लोग हुए बीमार
रिपोर्ट्स के मुताबिक, दवा खाने के बाद कुल 53 लोग बीमार पड़े हैं, जिनमें से 47 बच्चे शामिल हैं। इनमें से 29 को तेलंगाना के अस्पताल में और 24 को स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया है। जिला कलेक्टर दिनेश कुमार ने बताया कि मरीजों की सेहत स्थिर है और उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है।
जांच और सरकारी प्रतिक्रिया
जिला कलेक्टर के मुताबिक, क्लोरोक्वीन गोलियों का प्रारंभिक गुणवत्ता-नियंत्रण (Quality-Control) परीक्षण संतोषजनक पाया गया है। हालांकि, घटना की सटीक वजह जानने के लिए गांव में बांटी गई गोलियों का वही बैच विशाखापत्तनम स्थित फॉरेंसिक लैब में भेजा गया है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने अधिकारियों को इस मामले की गहन जांच करने और मरीजों को सर्वोत्तम इलाज मुहैया कराने के आदेश दिए हैं। उन्होंने वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों और जिला कलेक्टर से भी जानकारी ली है। जिला प्रशासन ने तीन बाल रोग विशेषज्ञों सहित विशेषज्ञ मेडिकल टीमें तैनात की हैं और एक मेडिकल कैंप लगाकर मरीजों की निगरानी शुरू कर दी है।
क्या दवा वितरण में नियमों का पालन हुआ?
यह घटना एक गंभीर सवाल खड़ा करती है: सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार, दवा की खुराक हर व्यक्ति के वजन और उम्र के अनुसार अलग-अलग तय की जानी चाहिए, खासकर बच्चों के लिए। पोलावरम में 71 लोगों को एक साथ गोलियां बांटे जाने और इनमें से एक 7 साल की बच्ची की मौत होने की घटना इस बात की जांच की मांग करती है कि क्या दवा बांटने के दौरान उम्र और वजन के हिसाब से खुराक तय करने के नियमों का पालन किया गया था।
सीख और निष्कर्ष:
- खुराक का महत्व: बच्चों को दवा देते समय उनकी उम्र और वजन के अनुसार सही खुराक का निर्धारण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- सुरक्षित वितरण: सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में दवा वितरण के दौरान कठोर प्रोटोकॉल और प्रशिक्षित कर्मियों का होना अनिवार्य है।
- जागरूकता: समुदायों और स्कूलों को दवा के संभावित दुष्प्रभावों और आपातकालीन स्थितियों से निपटने के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि स्वास्थ्य कार्यक्रमों में सुरक्षा और जवाबदेही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि ऐसी त्रासदियों को भविष्य में रोका जा सके। जांच के नतीजे ही इस दुखद घटना के पीछे की सच्चाई को सामने लाएंगे।