शिक्षा के लिए जान जोखिम में डालते बच्चे: सुरक्षित स्कूल मार्ग की ज़रूरत
भारत में शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, लेकिन क्या हर बच्चे को इसे सुरक्षित रूप से पाने का अवसर मिलता है? दुर्भाग्य से, देश के कई ग्रामीण इलाकों में बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़ती है। खतरनाक नदियाँ, उफनते बांध और टूटे हुए पुल उनके और उनकी शिक्षा के बीच की सबसे बड़ी बाधा बन गए हैं। यह स्थिति न केवल बच्चों के भविष्य पर सवाल उठाती है, बल्कि स्थानीय प्रशासन और सरकार की ज़िम्मेदारी पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
छत्तीसगढ़ का कोडार बांध: रोज़ का ख़तरा
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित कोडार डैम की कहानी ऐसी ही एक दुखद मिसाल है। यहां लोहार्डी स्कूल के बच्चे रोज़ाना अपनी जान जोखिम में डालकर कोडार बस्ती की ओर लौटते हैं। हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में देखा गया कि कैसे तेज बारिश के कारण बांध में पानी का स्तर बढ़ जाने के बावजूद स्कूली छात्र-छात्राएं इसी खतरनाक रास्ते से गुजरने को मजबूर हैं। एक हाथ में किताबें और दूसरे हाथ में ज़िंदगी का डर, यह उनकी रोज़मर्रा की सच्चाई बन गई है। स्थानीय ग्रामीण और सोशल मीडिया पर लोग इस बात पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं कि प्रशासन की लगातार अनदेखी किसी भी दिन एक बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
मध्य प्रदेश के विदिशा का स्टॉप डैम: 5 साल से जारी ख़तरा
मध्य प्रदेश से भी ऐसी ही एक मार्मिक कहानी सामने आई थी, जहां विदिशा जिले के पालोह गांव में बच्चे बेतवा नदी पर बने एक स्टॉप डैम के संकरे पिलरों को पार कर स्कूल जाते हैं। यह वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। पालोह हाई स्कूल में पढ़ने वाले करुआ गांव के इन बच्चों को अगर सड़क वाले सुरक्षित रास्ते से जाना पड़े, तो उन्हें रोज़ 8 से 10 किलोमीटर का अतिरिक्त सफर तय करना पड़ता है। इसी वजह से वे पिछले 5 सालों से अपनी जान जोखिम में डालकर इस खतरनाक स्टॉप डैम को पार कर रहे हैं।
वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन हरकत में आया। विदिशा के एसडीएम क्षितिज शर्मा ने बच्चों को सुरक्षित आवागमन के लिए साइकिल उपलब्ध कराने और नदी पर एक अस्थायी पुल बनाने का प्रस्ताव भेजने की बात कही। साथ ही, प्रभावित गांवों के पास नया स्कूल खोलने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि बच्चों को जानलेवा रास्ता पार न करना पड़े। यह कार्रवाई स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि इतने सालों तक इन बच्चों की सुरक्षा पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
सागर जिले की कोपरा नदी: टूटा पुल, उफनती धारा
मध्य प्रदेश के सागर जिले की रहली जनपद के अंतर्गत ग्राम पंचायत बेरखेड़ी कलां (बरखेड़ा कलां) से भी एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला वीडियो सामने आया था। यहां स्कूली छात्र-छात्राएं उफनती हुई कोपरा नदी को पार कर स्कूल जाने के लिए मजबूर हैं। दरअसल, नदी पर बनी पुलिया पूरी तरह टूट चुकी है, और इसकी मरम्मत नहीं हुई है। थोड़ी सी बारिश में ही नदी उफान पर आ जाती है, जिससे बच्चों को बिना किसी सुरक्षा के, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर या ग्रामीणों के सहारे इस खतरनाक धारा को पार करना पड़ता है।
मानसून के मौसम में यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है। घुटनों तक पानी में उतरकर स्कूल जाने से बच्चों की यूनिफॉर्म खराब होती है, और फिसलन व तेज बहाव के कारण गिरने का डर हमेशा बना रहता है। कई बार वे भीगने की वजह से बीमार पड़ जाते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई भी प्रभावित होती है। स्थानीय ग्रामीण लंबे समय से यहां पुल या कोई सुरक्षित मार्ग बनाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही है।
क्यों ज़रूरी है बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल मार्ग?
- सुरक्षा सर्वोपरि: बच्चों की जान की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। किसी भी बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
- शिक्षा का अधिकार: सुरक्षित रास्ता न होने के कारण कई बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं या उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है, जो शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
- स्वास्थ्य और कल्याण: खतरनाक रास्तों से गुजरने, भीगने या चोटिल होने से बच्चों के स्वास्थ्य और उनके मानसिक कल्याण पर बुरा असर पड़ता है।
- जिम्मेदारी: बच्चों को सुरक्षित और सुगम तरीके से स्कूल पहुंचाना सरकार, स्थानीय प्रशासन और समाज की सामूहिक ज़िम्मेदारी है।
निष्कर्ष
ये घटनाएं सिर्फ कुछ उदाहरण हैं; पूरे देश में ऐसे अनगिनत बच्चे हैं जो रोज़ाना इसी तरह के खतरों का सामना करते हुए स्कूल जाते हैं। यह समय है कि हम इन बच्चों की आवाज़ सुनें और उन्हें सुरक्षित भविष्य प्रदान करने के लिए ठोस कदम उठाएं। शिक्षा की राह में आने वाली इन जानलेवा बाधाओं को दूर करना हमारी सामूहिक प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि कोई भी बच्चा सिर्फ रास्ते की वजह से अपनी पढ़ाई या अपनी ज़िंदगी को जोखिम में डालने पर मजबूर न हो।