हार्वर्ड का ऐतिहासिक फैसला: ‘ए’ ग्रेड पर लगेगी लगाम, क्या ख़त्म होगा ग्रेड इन्फ्लेशन?

हर छात्र और माता-पिता का सपना होता है परीक्षाओं में बेहतरीन अंक प्राप्त करना। लेकिन, दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने एक ऐसे ऐतिहासिक फैसले से अकादमिक जगत में हलचल मचा दी है, जिसने ‘ए’ ग्रेड की परिभाषा को ही बदल दिया है। ग्रेड इन्फ्लेशन के बढ़ते खतरे को देखते हुए, हार्वर्ड ने अंडरग्रेजुएट कोर्सों में ‘ए’ ग्रेड को सीमित करने का निर्णय लिया है।

हार्वर्ड का क्रांतिकारी फैसला: ‘ए’ ग्रेड अब सिर्फ 20% छात्रों को

2027 अकादमिक सत्र से, हार्वर्ड में किसी भी क्लास में केवल 20% छात्रों को ही ‘ए’ ग्रेड मिलेगा। इस नीति के पक्ष में 458 फैकल्टी सदस्यों ने मतदान किया, जबकि 201 ने इसका विरोध किया। इस फैसले के पीछे का मुख्य तर्क ‘ग्रेड इन्फ्लेशन’ है, यानी जब उच्च ग्रेड इतने सामान्य हो जाते हैं कि वे छात्रों की वास्तविक क्षमता और असाधारण प्रदर्शन को सही ढंग से दर्शाना बंद कर देते हैं।

फैकल्टी का मानना है कि यदि सभी छात्रों को ‘ए’ ग्रेड मिलेगा, तो असाधारण प्रतिभा की पहचान करना असंभव हो जाएगा। यह चिंता निराधार नहीं है। हार्वर्ड में 2005 में लगभग 24% छात्र ‘ए’ ग्रेड कैटेगरी में थे। 2025 तक यह आंकड़ा 60% से ऊपर चला गया। पिछले अकादमिक सत्र में, उच्चतम जीपीए (ग्रेड पॉइंट एवरेज) पुरस्कार के लिए 55 छात्र बराबरी पर थे – इतने ‘टॉपर’ कि ‘असली टॉपर’ को पहचानना मुश्किल हो गया था।

ग्रेड इन्फ्लेशन का बढ़ता ग्राफ: येल और ब्राउन का अनुभव

यह समस्या केवल हार्वर्ड तक सीमित नहीं है। येल यूनिवर्सिटी में ‘ए’ और ‘ए माइनस’ ग्रेड लगभग 80% तक पहुँच गए हैं, जबकि ब्राउन यूनिवर्सिटी में दो-तिहाई छात्र ‘ए’ ग्रेड में थे। यह स्थिति दर्शाती है कि जो कभी ‘असाधारण’ माना जाता था, वह अब धीरे-धीरे ‘सामान्य’ होता जा रहा है।

नरम ग्रेडिंग के पीछे के कारण

पिछले दो दशकों में, विश्वविद्यालयों पर यह दबाव बढ़ा है कि वे छात्रों को खुश रखें, ताकि कोर्स इवैल्यूएशन में अच्छी प्रतिक्रिया मिले और संस्थान प्रतिस्पर्धा में पीछे न रहे। इसी दबाव के चलते, ग्रेडिंग लगातार नरम होती गई। हार्वर्ड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक स्टीवन पिंकर इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि ग्रेड इन्फ्लेशन ने विश्वविद्यालयों को एक मज़ाक बना दिया है। प्रोफेसरों को अक्सर इस बात का डर होता था कि यदि वे मानक सख्त रखेंगे, तो छात्र उनके कोर्सों से दूर हो जाएंगे।

हार्वर्ड के अर्थशास्त्री जेसन फर्मन और डेविड लैब्सन बताते हैं, “ज़्यादातर शिक्षक सख्त ग्रेडिंग चाहते थे, लेकिन अकेले ऐसा करने से डरते थे। छात्रों से मिलने वाला खराब फीडबैक या कम नामांकन उनके करियर पर नकारात्मक असर डाल सकता था। इसलिए, पूरी फैकल्टी ने मिलकर एक नियम बनाया।”

आसान ‘ए’ ग्रेड्स के नकारात्मक परिणाम

  • सीखने की प्रेरणा में कमी: आसान ‘ए’ ग्रेड्स छात्रों में सीखने की आंतरिक प्रेरणा को कम करते हैं। जब मेहनत और बिना मेहनत के समान परिणाम मिलते हैं, तो छात्र गंभीर प्रयास करने से कतराते हैं।
  • योग्यता बनाम विशेषाधिकार: जब अंक तालिका छात्रों की मेधावी क्षमता में अंतर बताना बंद कर देती है, तो नियोक्ता रसूख, सामाजिक पृष्ठभूमि और इंटर्नशिप जैसे कारकों पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं। इससे योग्यता के बजाय विशेषाधिकार को लाभ मिलता है।
  • डिग्री पर भरोसा कम: शिक्षकों का तर्क है कि यदि विश्वविद्यालय छात्रों की असली प्रवीणता, मौलिकता और विश्लेषणात्मक सोच की पहचान नहीं कर पाएगा, तो उसकी डिग्री पर उद्योगों का भरोसा कमजोर होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के युग में, जहां औसत काम भी ‘परफेक्ट’ लग सकता है, असली कौशल की पहचान और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

छात्रों की प्रतिक्रिया और प्रिंस्टन का उदाहरण

यह दिलचस्प है कि प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी ने भी 2000 के दशक में ऐसी ही एक नीति लागू की थी, लेकिन छात्रों और फैकल्टी के दबाव में उसे 2014 में हटाना पड़ा था। हार्वर्ड में भी छात्र इस फैसले से खुश नहीं हैं। एक सर्वेक्षण में 94% छात्रों ने इस नीति का विरोध किया है।

छात्रों की दलील है कि सीमित ‘ए’ ग्रेड्स अकादमिक प्रतिस्पर्धा को और भी जहरीला बना देंगे। कम ग्रेड मिलने के जोखिम के कारण छात्र कठिन विषयों को चुनने से बचेंगे, जिससे उनकी शिक्षा का दायरा सिकुड़ सकता है। हार्वर्ड तीन साल बाद इस नीति की समीक्षा करेगा, जिससे इसके दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन किया जा सकेगा।

नौकरी बाजार पर ग्रेड इन्फ्लेशन का असर

नौकरी बाजार में ग्रेड इन्फ्लेशन का असर स्पष्ट रूप से दिख रहा है। प्लॉस वन (PLOS ONE) के एक अध्ययन के अनुसार, ऊँचे ग्रेड से जीपीए की ‘सिग्नलिंग वैल्यू’ कमजोर हो रही है। नियोक्ता यह समझ नहीं पाते कि छात्र ने वाकई किसी विषय में महारत हासिल की है या उसे केवल आसान ग्रेडिंग का लाभ मिला है।

आज की कंपनियां मार्कशीट के अंकों से आगे बढ़कर छात्रों में वास्तविक कौशल और क्षमताओं की तलाश कर रही हैं। नेशनल एसोसिएशन ऑफ कॉलेजेस एंड एम्प्लॉयर्स (NACE) के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 90% नियोक्ता समस्या-समाधान की योग्यता और 80% टीमवर्क के प्रमाण चाहते हैं। यह दर्शाता है कि सिर्फ ‘ए’ ग्रेड अब पर्याप्त नहीं हैं; वास्तविक दुनिया के लिए आवश्यक कौशल कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं।

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