IIT दिल्ली में छात्र की दुखद आत्महत्या: मानसिक स्वास्थ्य और संस्थानों की जवाबदेही

हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली में एक बेहद दुखद घटना सामने आई, जब एमएससी फिजिक्स के छात्र ऋषिकेश कुमार ने 22 अगस्त को संस्थान परिसर में आत्महत्या कर ली। इस घटना ने देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, संस्थागत सहायता प्रणालियों और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतावनी है जो हमें उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के कल्याण के प्रति अधिक संवेदनशील होने का आह्वान करती है।

क्या हुआ था? एक दुखद घटना

बेगूसराय के रहने वाले ऋषिकेश कुमार ने आईआईटी दिल्ली के लेक्चरर हॉल कॉम्प्लेक्स की छठी मंजिल से कूदकर अपनी जान दे दी। पुलिस के अनुसार, वह सुबह कैंपस में आया था और कुछ ही देर में यह दुखद घटना घट गई। घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला, लेकिन उनके दोस्तों और परिवार ने जो बताया, उससे कई गंभीर पहलू सामने आते हैं। ऋषिकेश का शव चार दिन बाद उनके पैतृक गांव लाया गया, जहां अंतिम संस्कार हुआ।

मानसिक पीड़ा और संस्थागत चुनौतियां

ऋषिकेश के करीबियों और छात्रों के मुताबिक, वह हॉस्टल में कमरा न मिलने से बेहद परेशान थे। बार-बार कोशिशों के बावजूद हॉस्टल न मिलने पर उन्हें अपनी मां के साथ कॉलेज के बाहर कमरा लेकर रहना पड़ा। इस अलगाव ने उन्हें अपने सहपाठियों और कैंपस सपोर्ट नेटवर्क से दूर कर दिया। छात्रों का आरोप है कि प्रशासन के फैसलों ने ऋषिकेश को मानसिक रूप से तोड़ दिया। उनकी मानसिक स्थिति उनके पिता के निधन के बाद पहले से ही नाजुक थी, और हॉस्टल संबंधी समस्याओं ने इसे और बढ़ा दिया।

ऋषिकेश की मां आशा पोद्दार ने आईआईटी दिल्ली के हॉस्टल प्रशासन और डीन पर सीधे आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि हॉस्टल आवंटन में लगातार टालमटोल और डीन द्वारा किए गए कथित अपमान से आहत होकर ही उनके बेटे ने यह कदम उठाया। उन्होंने दिल्ली पुलिस में लिखित शिकायत भी दर्ज करवाई है।

छात्रों का विरोध प्रदर्शन और उनकी मांगें

ऋषिकेश की मौत के बाद, आईआईटी दिल्ली के छात्रों ने 24 अगस्त को लेक्चरर हॉल कॉम्प्लेक्स के बाहर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन और धरना दिया। बड़ी संख्या में छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया और अपनी आवाज उठाई। उनकी प्रमुख मांगों में स्टूडेंट अफेयर्स ऑफिस के डीन, एसोसिएट डीन और फिजिक्स डिपार्टमेंट के हेड के तत्काल इस्तीफे के साथ-साथ ऋषिकेश के परिवार को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा देना भी शामिल था। छात्रों का तर्क है कि संस्थान छात्र कल्याण के प्रति उदासीन रहा है।

केवल आईआईटी दिल्ली ही नहीं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) ने भी 23 अगस्त को आईआईटी दिल्ली के गेट नंबर 5 के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने छात्र की मौत की जवाबदेही तय करने की मांग की और इसे आईआईटी दिल्ली की उदासीनता का मामला बताया। JNUSU ने संस्थान से छात्र मौतों के लंबे सिलसिले को गंभीरता से लेने और इसके कारणों पर जवाब देने की मांग की। उन्होंने इस मुद्दे को छात्रों के साथ भेदभाव और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के छात्रों की समस्याओं से भी जोड़ा तथा ‘रोहित एक्ट’ को लागू करने की बात कही।

आईआईटी दिल्ली की प्रतिक्रिया: जांच समिति का गठन

छात्रों के बढ़ते दबाव और विरोध के बाद, आईआईटी दिल्ली ने 5 सदस्यीय बाहरी जांच समिति का गठन किया है। इस समिति को छात्रों, शिक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों से बात करने के साथ-साथ संस्थान की प्रक्रियाओं और प्रोटोकॉल्स की समीक्षा करने का काम सौंपा गया है। समिति को लगभग दो सप्ताह में अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। उम्मीद है कि यह जांच भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस सुझाव देगी।

क्या है रोहित एक्ट?

रोहित एक्ट (या रोहित वेमुला एक्ट) एक प्रस्तावित कानून है जिसका उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव और उत्पीड़न को रोकना है। इसका नाम हैदराबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी शोधकर्ता रोहित वेमुला के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने 17 जनवरी 2016 को आत्महत्या कर ली थी। उनकी मृत्यु के बाद, पूरे देश के कैंपस में जातिगत भेदभाव के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन हुए थे। रोहित एक्ट की मांग यह सुनिश्चित करने के लिए है कि कोई भी छात्र जाति, वर्ग या किसी अन्य पृष्ठभूमि के कारण भेदभाव या उत्पीड़न का शिकार न हो, और सभी छात्रों को एक सुरक्षित और सहायक शैक्षिक वातावरण मिल सके।

आगे का रास्ता: मानसिक स्वास्थ्य और जवाबदेही

यह दुखद घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे उच्च शिक्षण संस्थान छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक कल्याण के लिए कितने तैयार हैं। हॉस्टल आवंटन जैसी मूलभूत समस्याओं का त्वरित समाधान न होना और छात्रों की मानसिक स्थिति को गंभीरता से न लेना, गंभीर चिंता का विषय है। यह आवश्यक है कि संस्थान छात्रों के लिए मजबूत परामर्श सेवाएं, सुलभ सहायता नेटवर्क और एक संवेदनशील प्रशासनिक ढांचा स्थापित करें। छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना और उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुनना, केवल नैतिक ही नहीं, बल्कि एक प्रभावी संस्थागत नीति भी है। ऋषिकेश की आत्महत्या एक वेक-अप कॉल है, जिसे हमें गंभीरता से लेना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके।

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