आईआईटी मंडी में भगवद्गीता पोस्टर विवाद: क्या है पूरा मामला और संस्थान का रुख?

आईआईटी मंडी में भगवद्गीता पोस्टर विवाद: क्या है पूरा मामला और संस्थान का रुख?

हाल ही में आईआईटी मंडी परिसर में भगवद्गीता पर आधारित एक पोस्टर ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है, जिसने देश भर में जातिगत भेदभाव और धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या पर बहस छेड़ दी है। आइए जानते हैं क्या है यह पूरा मामला और संस्थान ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी है।

क्या था विवादित पोस्टर?

आईआईटी मंडी में जन्माष्टमी के दौरान लगाए गए एक भगवद्गीता-थीम वाले पोस्टर में शूद्रों के काम को ‘ऊंची जातियों की सेवा करना’ बताया गया था। यह व्याख्या भारतीय संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होने के कारण तुरंत ही आलोचना का शिकार हो गई।

संस्थान के निदेशक की प्रतिक्रिया

मामला सामने आने के बाद संस्थान के निदेशक लक्ष्मीधर बेहरा ने तुरंत इस पर संज्ञान लिया। उन्होंने कहा कि यह छात्रों की अपनी व्याख्या थी और संस्थान का इससे कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं और एक जांच समिति का गठन भी किया है।

कैंपस को भेजा माफीनामा

विवाद बढ़ने पर, निदेशक बेहरा ने पूरे कैंपस को एक ईमेल भेजा, जिसका शीर्षक था ‘कैंपस में हाल ही में लगाए गए पोस्टर की खुली निंदा।’ इसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्थान ऐसे विचारों का समर्थन नहीं करता और उन्हें इस घटना से ‘झटका’ लगा है। उन्होंने यह भी लिखा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हर मंच पर जातिगत भेदभाव के हर रूप के खिलाफ लड़ाई लड़ी है और उन लोगों की भावनाओं को समझते हैं जो इससे आहत हुए हैं।

जांच समिति का गठन

इस पूरे प्रकरण की जांच के लिए फैकल्टी सदस्यों के साथ-साथ SC और OBC सहित विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों वाली एक समिति बनाई गई है। निदेशक बेहरा ने कहा कि वे इस दौरान कैंपस से बाहर थे और पोस्टर उन्होंने देखा तक नहीं है। वे किसी का पक्ष नहीं लेना चाहते और फैसला समिति पर छोड़ते हैं।

निदेशक लक्ष्मीधर बेहरा का गीता से जुड़ाव और पिछले विवाद

लक्ष्मीधर बेहरा स्वयं लंबे समय से भगवद्गीता पढ़ाते आए हैं और इस्कॉन (ISKCON) से भी उनका गहरा नाता है। वे आईआईटी मंडी में गीता पर एक पूरा कोर्स भी पढ़ाते हैं और प्रस्तावित भक्तिवेदांत यूनिवर्सिटी के संस्थापक भी हैं, जिसे इस्कॉन की एक पहल बताया जाता है।

उन्होंने दावा किया है कि इस्कॉन ही एकमात्र संगठन है जो जाति-आधारित भेदभाव के खिलाफ सबसे सख्ती से बोलता है, और वहां शूद्र व मुस्लिम समुदाय के लोग भी पुजारी हैं। वे मानते हैं कि सारे काम गुण और कर्म से तय होते हैं, जाति से नहीं।

हालांकि, बेहरा पहले भी कई बार विवादों में रह चुके हैं:

  • मांस न खाने की कसम: 2023 में उन्होंने छात्रों से मांस न खाने की कसम दिलवाई थी, यह कहते हुए कि हिमाचल में भूस्खलन जैसी घटनाएं जानवरों पर हो रही क्रूरता के कारण हैं।
  • ‘बुरी आत्माओं’ से मुक्ति: निदेशक बनने के तुरंत बाद, एक वीडियो सामने आया था जिसमें उन्होंने मंत्र जपकर एक दोस्त के परिवार को ‘बुरी आत्माओं’ से छुटकारा दिलाने का दावा किया था।
  • पुनर्जन्म पर सम्मेलन: जून में भी आईआईटी मंडी के इंडियन नॉलेज सिस्टम एंड मेंटल हेल्थ सेंटर ने गीता, आयुर्वेद और पुनर्जन्म पर एक सम्मेलन कराया था, जिसमें बेहरा मुख्य भूमिका में थे।

संस्थान की प्रतिबद्धता

निदेशक ने अपने ईमेल में दोहराया कि संस्थान भारतीय संविधान में दर्ज समानता, सामाजिक न्याय और वैज्ञानिक सोच जैसे मूल्यों को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने पूरे कैंपस से हर तरह के भेदभाव के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होने की अपील की है।

यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि शिक्षा संस्थानों में धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या और उनके सामाजिक प्रभाव पर कितनी संवेदनशीलता और सावधानी की आवश्यकता है। जांच समिति का फैसला इस मामले में आगे की राह तय करेगा।

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