हाल ही में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में 10 अगस्त 2026 को ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर’ नामक एक महत्वपूर्ण पुस्तक पर चर्चा का आयोजन किया गया था। जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन (JNUSU) से जुड़े छात्रों द्वारा अंतरराष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाना था, ताकि आदिवासी इतिहास और सत्ता के जटिल सवालों पर गहन संवाद हो सके।
कार्यक्रम रद्द होने का विवाद
चर्चा के लिए पहले से बुक किए गए SSS-1 ऑडिटोरियम की बुकिंग को जेएनयू प्रशासन ने अंतिम समय में रद्द कर दिया। प्रशासन का तर्क था कि कार्यक्रम की अनुमति के लिए दी गई जानकारी अधूरी थी और कुछ महत्वपूर्ण तथ्य विश्वविद्यालय से छिपाए गए थे। इस निर्णय ने परिसर में एक नई बहस छेड़ दी, जिसमें अकादमिक स्वतंत्रता और विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए गए।
छात्रों का दृढ़ संकल्प और वैकल्पिक मंच
प्रशासनिक बाधाओं के बावजूद, छात्रों ने अपने कार्यक्रम को रद्द करने से इनकार कर दिया। JNUSU ने स्पष्ट किया कि किसी सभागार की बुकिंग रद्द होने से छात्रों के बीच होने वाली अकादमिक चर्चा और बातचीत को रोका नहीं जा सकता। इसके बाद, छात्रों ने परिसर में ही SSS-2 भवन के बाहर एक वैकल्पिक स्थान पर चर्चा आयोजित करने का फैसला किया। दोपहर करीब 3 बजे शुरू हुई इस चर्चा में बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए, जो ज्ञान और विमर्श के प्रति उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।
बहस के दौरान विरोध प्रदर्शन और प्रशासनिक पक्ष
SSS-2 में चर्चा के दौरान, एक तरफ कार्यक्रम समर्थक छात्र मौजूद थे, वहीं दूसरी तरफ विरोध करने वाले छात्रों ने नारेबाजी की। इस विरोध प्रदर्शन के कारण कार्यक्रम को कुछ समय के लिए रोकना पड़ा, जिसने परिसर में तनावपूर्ण माहौल पैदा किया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने पक्ष में बताया कि कार्यक्रम की अनुमति देने और उसे रद्द करने की कार्रवाई दोनों SSS के डीन द्वारा की गई थी। डीन की ओर से SSS के प्रोफेसर अविनाश कुमार को भी कार्यक्रम रद्द किए जाने की जानकारी दी गई थी।
‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज’: पुस्तक का अकादमिक महत्व
यह कार्यक्रम केवल एक विवाद तक सीमित नहीं था, बल्कि उमर खालिद की पुस्तक ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर’ के गहन अकादमिक पहलुओं पर केंद्रित था। यह पुस्तक खालिद के पीएचडी शोध पर आधारित है और झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासी समाज, उनके इतिहास, और उस दौर में सत्ता-संबंधों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है। कार्यक्रम स्थल पर पुस्तक का एक स्टॉल भी लगाया गया था, जिसने उपस्थित लोगों को इसके विषयों से जुड़ने का अवसर दिया। यह पुस्तक आदिवासी समुदायों की जटिलताओं और उनके ऐतिहासिक अनुभवों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
उमर खालिद और अकादमिक बहस का संदर्भ
इस कार्यक्रम और संबंधित विवाद की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि उमर खालिद जेएनयू के पूर्व छात्र हैं और वर्तमान में 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में आरोपी के तौर पर जेल में हैं। इस संदर्भ में, विश्वविद्यालय परिसर में उनकी पुस्तक पर चर्चा को लेकर प्रशासन और छात्र समुदाय के बीच यह टकराव अकादमिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और छात्र अधिकारों पर एक व्यापक बहस को जन्म देता है। यह घटना दर्शाती है कि कैसे अकादमिक मंचों पर होने वाली चर्चाएं अक्सर बड़े सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से जुड़ जाती हैं, जिससे विश्वविद्यालय परिसरों में स्वतंत्र संवाद और महत्वपूर्ण बहस की आवश्यकता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।