भारत में सरकारी स्कूलों की बदहाली: लाखों बच्चों का भविष्य दांव पर?

जहां एक ओर देश में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, बीते 10 सालों में देशभर में 94 हजार से ज़्यादा स्कूल बंद हो चुके हैं। यह आंकड़े न केवल चिंतित करने वाले हैं, बल्कि हमारे शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं।

चौंकाने वाले आंकड़े: बंद होते स्कूल और घटता नामांकन

UDISE (Unified District Information System for Education) की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में पिछले 10 सालों में 94,000 से अधिक स्कूल बंद हुए हैं। कम नामांकन के कारण इन स्कूलों को या तो अस्थाई रूप से बंद कर दिया गया है या फिर अन्य स्कूलों में मर्ज (विलय) कर दिया गया है। इस दौरान लगभग 26 लाख बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो गया है।

  • सरकारी स्कूलों में नामांकन लगातार गिर रहा है। सत्र 2024-25 में छात्रों का नामांकन 12.15 करोड़ था, जो सत्र 2025-26 में घटकर 11.89 करोड़ रह गया है।
  • इसके विपरीत, निजी स्कूलों में छात्रों का नामांकन बढ़ा है, जो सरकारी स्कूलों की गिरती लोकप्रियता का संकेत है।

मध्य प्रदेश: शिक्षा संकट का केंद्रबिंदु

देशभर में बंद हुए स्कूलों में सबसे ज़्यादा हिस्सेदारी मध्य प्रदेश की है। UDISE+ 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में 2,426 सरकारी स्कूल बंद या मर्ज किए गए हैं, जो देशभर के कुल 4,791 ऐसे स्कूलों का 50.6% है। यह आंकड़ा राज्य में शिक्षा के प्रति गंभीर संकट को दर्शाता है।

ड्रॉपआउट की भयावह स्थिति

मध्य प्रदेश में छात्रों का ड्रॉपआउट रेट (बीच में पढ़ाई छोड़ना) चिंताजनक है:

  • पिछले साल 15.25 लाख छात्र स्कूल से गायब रहे।
  • इस साल फिर 11.12 लाख छात्रों के स्कूल छोड़ने की आशंका है।
  • राज्य में कक्षा 1 से 12वीं तक का रिटेंशन रेट (कितने छात्र पढ़ाई जारी रखते हैं) केवल 37.3% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 51.9% है। इसका मतलब है कि 12वीं तक पहुँचते-पहुँचते 62.7% बच्चे स्कूल की मुख्यधारा से बाहर हो जाते हैं।

छात्रों के पंजीकरण में भी बड़ा अंतर देखने को मिला है। सत्र 2025-26 में राज्य के शिक्षा पोर्टल पर 1.35 करोड़ छात्र पंजीकृत थे, जबकि UDISE रिपोर्ट में यह डेटा 1.52 करोड़ था। अधिकारियों का कहना है कि यह अंतर 17 लाख प्री-प्राइमरी डेटा के कारण है।

सबसे ज्यादा ड्रॉपआउट वाले ज़िले

मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा ड्रॉपआउट वाले ज़िले इस प्रकार हैं:

  • इंदौर: 45,233 छात्र
  • मुरैना: 44,466 छात्र
  • ग्वालियर: 40,663 छात्र
  • भोपाल: 38,072 छात्र
  • सागर: 35,953 छात्र

स्कूल बंद होने के गंभीर परिणाम

कम नामांकन को स्कूलों को बंद करने का मुख्य कारण बताया जाता है। लेकिन इसके दुष्परिणाम कई गुना ज़्यादा हैं:

  • बढ़ी हुई दूरी: स्कूल बंद होने से बच्चों के लिए स्कूल की दूरी 1 से 5 किमी तक बढ़ गई है। यातायात की सुविधा न होने के कारण इन बच्चों को इतनी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है।
  • आर्थिक और सुरक्षा बोझ: अभिभावकों पर बच्चों को दूर स्कूल भेजने का आर्थिक और सुरक्षा संबंधी बोझ बढ़ गया है।
  • गरीब परिवारों पर मार: आर्थिक बोझ के चलते गरीब परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई छुड़वाने या उन्हें निजी स्कूलों में भेजने पर मजबूर हो रहे हैं, जो उनके लिए अक्सर संभव नहीं होता।

उज्जैन का सराफा कन्या विद्यालय: एक कड़वा सच

हाल ही में उज्जैन में सराफा कन्या विद्यालय को दाऊदखेड़ी शिफ्ट करने का फैसला लिया गया था, जिसके विरोध में छात्राओं ने प्रदर्शन किया। छात्राओं का कहना था कि स्कूल मर्ज होने से उन्हें 10 किमी दूर जाना पड़ेगा, जिससे पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो जाएगा। स्कूल के दूर शिफ्ट होने के बाद छात्राओं की संख्या 580 से घटकर 415 रह गई, यानी 165 छात्राओं की कमी आई। कक्षा 9वीं में भी यह संख्या 180 से घटकर 120 रह गई।

क्या कर रहा है प्रशासन? और आगे की राह…

शिक्षा केंद्र के अपर संचालक के अनुसार, चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम के माध्यम से 3.16 लाख बच्चों को दोबारा स्कूलों से जोड़ा गया है। इस बार 6 साल के बच्चों को ट्रैक करने के लिए शिक्षकों को समय पोर्टल के जरिए जोड़ा जा रहा है।

हालांकि, यह समस्या सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह लाखों बच्चों के भविष्य और देश की नींव पर गहरा असर डालती है। सरकारी स्कूलों को बचाने और बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में बनाए रखने के लिए केवल दावे नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। शिक्षा के अधिकार का सही मायने में पालन हो सके, इसके लिए सरकार, समाज और अभिभावकों को मिलकर काम करना होगा।

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