हाल ही में, दुनिया भर की शीर्ष विश्वविद्यालयों से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के 1800 से अधिक प्रोफेसरों ने चिंता व्यक्त की है कि नए अंडरग्रेजुएट छात्र बुनियादी गणित और रीडिंग में भी संघर्ष कर रहे हैं, जो मिडिल-स्कूल (कक्षा 6-8) के स्तर का है। उन्हें कॉलेज में यह गणित दोबारा पढ़ाना पड़ रहा है।
सैन डिएगो की एक रिसर्च बताती है कि हाई-स्कूल स्तर से भी कम गणितीय समझ वाले छात्रों की संख्या पिछले पाँच सालों में तीस गुना बढ़ गई है। हार्वर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थान भी अपने पाठ्यक्रम को छोटा करने पर मजबूर हैं क्योंकि छात्र जटिल वाक्यों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं। आखिर क्यों आ रही है यह गिरावट? आइए, इसके प्रमुख कारणों और संभावित समाधानों को समझते हैं।
अटेंशन स्पैन में कमी: सोशल मीडिया का प्रभाव
आज के डिजिटल युग में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने हमारे अटेंशन स्पैन (ध्यान केंद्रित करने की क्षमता) को काफी कम कर दिया है, और छात्र इससे अछूते नहीं हैं। ओईसीडी (OECD) के अनुसार, छात्र अब लंबे और जटिल टेक्स्ट पढ़ने से बचते हैं। अमेरिका में, जहाँ 1990 के दशक में 60% बच्चे शौक से किताबें पढ़ते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर केवल 37% रह गई है। छात्र अब जानकारी को सिर्फ सरसरी तौर पर स्कैन करते हैं, जिससे भाषा को गहराई से समझने और उसका विश्लेषण करने की क्षमता कमजोर हुई है।
कमजोर नींव: स्कूलों से मिली समस्या
यह समस्या कॉलेजों को विरासत में स्कूलों से मिली है। विशेषज्ञ जेसिका हूटन विल्सन का कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान स्कूल बंद होने से छात्रों की शिक्षा को भारी नुकसान हुआ। कई छात्र कॉलेज तक पहुँच तो गए, लेकिन उनकी बुनियादी समझ इतनी कमजोर है जैसे वे कभी हाई स्कूल गए ही न हों। PISA और NAEP जैसे अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आंकड़े भी बताते हैं कि शिक्षा का स्तर महामारी से पहले ही गिरना शुरू हो गया था। बुनियादी पाठ्यक्रम और ठोस तथ्यों के बजाय ‘सॉफ्ट स्किल्स’ पर अधिक जोर देने से छात्रों की शैक्षिक नींव कमजोर हुई है।
मूल्यांकन में चुनौतियाँ और आसान ग्रेड का चलन
महामारी के बाद, अमेरिका के 90% से अधिक कॉलेजों ने SAT जैसे मानक टेस्ट को वैकल्पिक कर दिया या पूरी तरह बंद कर दिया। स्कूलों में भी बच्चों को खुश करने के लिए आसानी से नंबर दिए जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि हाई स्कूल में ‘परफेक्ट स्कोर’ पाने वाले छात्र भी कॉलेज पहुँचकर बुनियादी गणित और भाषा में विफल हो जाते हैं। यूनिवर्सिटी के पास अब यह परखने का कोई ठोस तरीका नहीं बचा है कि प्रवेश लेने वाला छात्र वास्तव में योग्य है या नहीं।
शॉर्टकट संस्कृति और AI का बढ़ता प्रयोग
ब्रिटेन के थिंक-टैंक एचईपीआई (HEPI) और बर्कले की स्टडी के अनुसार, 94% छात्र पढ़ाई किए बिना पास होने के लिए AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद ले रहे हैं। प्रोफेसरों पर भी अच्छे नंबर देने का दबाव रहता है ताकि उन्हें खराब फीडबैक से बचाया जा सके। जब बिना मेहनत के AI से ‘ए’ ग्रेड मिल रहा है, तो छात्रों में सीखने की आंतरिक प्रेरणा लगभग खत्म हो चुकी है।
समाधान क्या हैं?
बर्कले की प्रोफेसर मीना अगानागिक के अनुसार, इस समस्या को दूर करने के लिए कुछ कड़े कदम उठाने जरूरी हैं:
- अनिवार्य असेसमेंट और सरप्राइज टेस्ट: क्लासरूम में अचानक छात्रों से सवाल पूछना, अनिवार्य असेसमेंट और सरप्राइज पेन-पेपर टेस्ट लागू करना।
- प्रवेश में योग्यता की जाँच: ग्रेड इन्फ्लेशन और AI से नकल रोकने के लिए एडमिशन के समय छात्रों की योग्यता की कड़ी जाँच करना।
- क्लासरूम में गैजेट्स पर पाबंदी: पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकाने वाले गैजेट्स पर क्लासरूम में प्रतिबंध लगाना।
- कड़े मापदंड और सख्त ग्रेडिंग: कड़े मापदंड और सख्त ग्रेडिंग प्रणाली अपनाने से ही बिना तैयारी के आने वाले छात्रों को रोका जा सकेगा और वे मेहनत करने के लिए प्रेरित होंगे।
निष्कर्ष
छात्रों की गिरती शैक्षिक गुणवत्ता एक गंभीर वैश्विक चिंता का विषय है। यह केवल छात्रों का नहीं, बल्कि पूरे समाज और भविष्य का नुकसान है। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली की नींव को मजबूत करने, छात्रों में गहन सीखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने और आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के लिए ठोस नीतियां बनाने की आवश्यकता है। केवल तभी हम एक सुशिक्षित और सक्षम युवा पीढ़ी का निर्माण कर पाएंगे।