सीबीएसई त्रिभाषा नीति: सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, जानें नीति, विवाद और छात्रों पर प्रभाव

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की त्रिभाषा नीति (Three Language Policy) एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल ही में, छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के एक समूह ने इस नीति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसके बाद देश भर में शिक्षाविदों और छात्रों के बीच बहस छिड़ गई है। यह याचिका विशेष रूप से कक्षा 9वीं में इस नीति के कार्यान्वयन के विरोध में दायर की गई है। आइए जानते हैं क्या है यह नीति, क्यों इसे चुनौती दी गई है और इसका लाखों छात्रों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

क्या है CBSE की त्रिभाषा नीति?

CBSE ने 15 मई को एक सर्कुलर जारी कर शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 9वीं और 10वीं के लिए त्रिभाषा नीति को अनिवार्य कर दिया था। इस नीति के तहत, छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएँ होनी अनिवार्य हैं। यह नया नियम 1 जुलाई से लागू होगा, और छात्रों को 31 मई तक अपनी तीसरी भाषा का चुनाव करने का समय दिया गया था।

  • अनिवार्यता: कक्षा 9वीं और 10वीं में तीन भाषाएँ पढ़ना अनिवार्य।
  • भारतीय भाषाओं पर जोर: चुनी गई तीन भाषाओं में से कम से कम दो भारतीय भाषाएँ होनी चाहिए।
  • लागू होने की तिथि: शैक्षणिक सत्र 2026-27 से प्रभावी (नोटिफिकेशन 1 जुलाई से)।

सुप्रीम कोर्ट में क्यों दी गई चुनौती?

19 लोगों के एक समूह, जिसमें छात्र, अभिभावक और शिक्षक शामिल हैं, ने सुप्रीम कोर्ट में इस नीति को चुनौती दी है। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी पेरेंट्स की तरफ से इस मामले में पैरवी कर रहे हैं। जस्टिस जॉयमाल्या और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच अगले हफ्ते इस मामले की सुनवाई करेगी। याचिकाकर्ताओं ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं:

  • CBSE पर वादाखिलाफी का आरोप: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि CBSE ने 9 अप्रैल को स्पष्ट किया था कि तीसरी भाषा का नियम (R3) 9वीं कक्षा के छात्रों पर 2029-30 सत्र तक लागू नहीं होगा। लेकिन अब CBSE अपने ही फैसले से पलट गया है।
  • मनमाना और जल्दबाजी में लिया गया फैसला: याचिका में CBSE और NCERT पर मनमाना फैसला लेने का आरोप लगाया गया है। अभिभावकों और शिक्षकों का तर्क है कि CBSE ने पहले खुद माना था कि प्रशिक्षित शिक्षकों और पाठ्यपुस्तकों की कमी है, फिर भी इसे स्कूलों पर थोपा जा रहा है।
  • बुनियादी ढांचे की कमी: उनका मानना है कि बिना पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित शिक्षकों और उचित शिक्षण प्रणाली के एक नया विषय थोपना सार्थक शिक्षा नहीं है।
  • नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के खिलाफ: याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना है कि यह सर्कुलर नई शिक्षा नीति 2020 की मूल भावना के खिलाफ है। NEP में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी राज्य या छात्र पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी।

लाखों छात्र होंगे प्रभावित

इस फैसले से 9वीं और 10वीं कक्षा के लगभग 50 लाख छात्र सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। हालांकि, CBSE ने स्पष्ट किया है कि इस साल 10वीं बोर्ड परीक्षा में तीसरी भाषा का पेपर नहीं होगा, लेकिन छात्रों के लिए इसकी पढ़ाई करना अनिवार्य रहेगा।

CBSE और NCERT के प्रयास

CBSE ने अपने सर्कुलर में कुछ स्पष्टीकरण और निर्देश भी दिए हैं:

  • शिक्षकों की व्यवस्था: CBSE ने स्वीकार किया है कि कुछ स्कूलों को भारतीय मूल की भाषाओं के लिए योग्य शिक्षक ढूंढने में कठिनाई हो सकती है। ऐसे में स्कूलों को हाइब्रिड टीचिंग सपोर्ट, सेवानिवृत्त भाषा शिक्षकों की नियुक्ति, और योग्य पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षकों को हायर करने की अनुमति दी गई है।
  • पाठ्यपुस्तकें: CBSE और NCERT कक्षा VI (R3) के लिए 19 भाषाओं में किताबें तैयार कर रहे हैं, जिनमें असमिया, बंगाली, गुजराती, मराठी, तमिल और तेलुगु जैसी भाषाएँ शामिल हैं। जब तक नई किताबें उपलब्ध नहीं होतीं, तब तक 9वीं के छात्र 6वीं कक्षा की तीसरी भाषा की किताबों से पढ़ाई करेंगे।
  • स्थानीय साहित्य का उपयोग: स्कूलों को पढ़ाई के लिए स्थानीय और राज्य स्तरीय साहित्य (कविताएँ, कहानियाँ आदि) उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया गया है।
  • भाषा चयन की सुविधा: स्कूलों को छात्रों की पसंद के अनुसार तीसरी भाषा चुनने की अनुमति है, और उन्हें 30 जून तक बोर्ड को इसकी जानकारी देनी होगी।

नई शिक्षा नीति 2020 और त्रिभाषा सूत्र

नई शिक्षा नीति 2020, जिसे भारत सरकार ने 29 जुलाई, 2020 को मंजूरी दी थी, 34 साल बाद भारत की शिक्षा नीति में एक बड़ा बदलाव है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की शिक्षा प्रणाली को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना है। NEP 2020 त्रिभाषा सूत्र की सिफारिश करती है लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करती है कि किसी छात्र पर कोई भाषा थोपी न जाए। यही कारण है कि वर्तमान CBSE नीति को NEP की भावना के खिलाफ बताया जा रहा है।

शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है, जिसका अर्थ है कि केंद्र और राज्य सरकार दोनों को इस पर अधिकार है। ऐसे में, राज्यों के लिए इस नीति को पूरी तरह से लागू करना अनिवार्य नहीं है, और टकराव की स्थिति में आम सहमति से समाधान सुझाया गया है।

निष्कर्ष

CBSE की त्रिभाषा नीति का उद्देश्य छात्रों को भाषाई विविधता से जोड़ना और बहुभाषी क्षमता विकसित करना है, जैसा कि नई शिक्षा नीति में परिकल्पित है। हालांकि, इसके कार्यान्वयन को लेकर उठ रहे सवाल और सुप्रीम कोर्ट की चुनौती एक महत्वपूर्ण मोड़ है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद ही इस मामले की आगे की दिशा तय हो पाएगी, जिसका लाखों छात्रों के भविष्य पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।

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