मध्य प्रदेश: जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते बच्चे – सुरक्षित शिक्षा की पुकार
मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में बच्चों के लिए स्कूल जाना सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि जान का जोखिम भरा सफर है। विदिशा और सागर जिलों से सामने आए कुछ वीडियो इस गंभीर समस्या को उजागर करते हैं, जहाँ मासूम बच्चे अपनी जान हथेली पर रखकर शिक्षा प्राप्त करने का साहस कर रहे हैं। यह स्थिति बच्चों की शिक्षा के प्रति उनके समर्पण को तो दर्शाती है, लेकिन स्थानीय प्रशासन और सरकार के सामने सुरक्षा और मूलभूत सुविधाओं को सुनिश्चित करने की बड़ी चुनौती भी खड़ी करती है।
विदिशा का पालोह गाँव: जहाँ स्कूल का रास्ता बना जीवन की चुनौती
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के पालोह गाँव की कहानी दिल दहला देने वाली है। यहाँ के बच्चे, जो करुआ गाँव के रहने वाले हैं और पालोह के हाई स्कूल में पढ़ते हैं, हर दिन एक खतरनाक रास्ता तय करते हैं। उन्हें बेतवा नदी पर बने एक स्टॉप डैम को पार करना पड़ता है, जिसके संकरे पिलरों पर चलना और बीच के गैप को छलांग लगाकर पार करना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं। यदि ये बच्चे सड़क वाले लंबे रास्ते से स्कूल जाएँ, तो उन्हें प्रतिदिन लगभग 8 से 10 किलोमीटर का सफर तय करना होगा। इसी कारण, वे पिछले 5 सालों से अपनी जान दांव पर लगाकर इसी खतरनाक स्टॉप डैम के रास्ते स्कूल पहुँचते रहे हैं।
प्रशासन की नींद टूटी, समाधान की पहल शुरू
इन बच्चों का यह हृदयविदारक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद ही प्रशासन की नींद खुली। विदिशा के एसडीएम, क्षितिज शर्मा ने तुरंत मामले की जानकारी ली और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएँ कीं। उन्होंने बताया कि बच्चों को सुरक्षित रास्ते से स्कूल आने-जाने के लिए साइकिल उपलब्ध कराई जाएगी। इसके साथ ही, नदी पर एक अस्थायी पुल बनाने का प्रस्ताव भी भेजा गया है। प्रशासन इस बात पर भी विचार कर रहा है कि क्या प्रभावित गाँवों के पास नया स्कूल खोला जा सकता है, ताकि बच्चों को नदी पार करने का जोखिम न उठाना पड़े। जिला कलेक्टर ने भी स्थिति का आकलन किया और पास के मिडिल स्कूल को हाई स्कूल में अपग्रेड करने की प्रक्रिया शुरू की, ताकि बच्चों को दूर न जाना पड़े।
सागर के बेरखेड़ी कलां में भी उफनती नदी का कहर
यह अकेले विदिशा की कहानी नहीं है। मध्य प्रदेश के सागर जिले के रहली जनपद के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत बेरखेड़ी कलां (बरखेड़ा कला) से भी ऐसा ही एक और वीडियो सामने आया है। यहाँ स्कूली छात्र-छात्राएँ उफनती हुई कोपरा नदी को पार कर स्कूल जाने को मजबूर हैं। कोपरा नदी पर बनी पुलिया पूरी तरह टूट चुकी है, और बच्चे बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर और ग्रामीणों के सहारे इस खतरनाक नदी को पार करते हैं। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, हर साल मानसून के मौसम में बच्चों को इसी तरह अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने जाना पड़ता है। ग्रामीणों ने लंबे समय से सरकार से पुल या एक सुरक्षित मार्ग की मांग की है, क्योंकि यहाँ बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने के साथ-साथ किसी दुर्घटना का भी खतरा बना रहता है।
देशभर में चिंता, सुरक्षित शिक्षा की पुकार
इन वीडियो के सामने आने के बाद देशभर के लोगों ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। सोशल मीडिया पर यूजर्स ने प्रशासन और शिक्षा विभाग से सवाल उठाए हैं कि अगर बच्चे इतने सालों से इसी तरह स्कूल जा रहे थे, तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? यह घटनाएँ सिर्फ कुछ गाँवों की नहीं, बल्कि देश के कई ग्रामीण इलाकों की सच्चाई को उजागर करती हैं, जहाँ बच्चों को शिक्षा के लिए मूलभूत सुविधाओं से जूझना पड़ता है। हर बच्चे को सुरक्षित और सुलभ शिक्षा का अधिकार है, और उसे पाने की कीमत उनकी जान नहीं होनी चाहिए।
बच्चों के सुरक्षित भविष्य और उनके शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन को ठोस और स्थायी कदम उठाने होंगे। केवल अस्थायी समाधान ही नहीं, बल्कि ऐसी दीर्घकालिक योजनाएँ बनानी होंगी जो बच्चों को हर मौसम में सुरक्षित स्कूल पहुँचने में मदद करें।