सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी: देश की ऐतिहासिक विरासत जो सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में फंसी

सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी: देश की ऐतिहासिक विरासत जो सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में फंसी

भारत की राजधानी दिल्ली, जहां इतिहास और आधुनिकता का संगम होता है, वहीं एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर भी है जिस पर इन दिनों अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। हम बात कर रहे हैं सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी (CSL) की, जो देश की सबसे पुरानी और दूसरी सबसे बड़ी सरकारी लाइब्रेरी है। 1969 में शास्त्री भवन में स्थापित यह लाइब्रेरी, जो लगभग 5500 स्क्वायर मीटर में चार मंजिलों में फैली हुई है, अब सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत तोड़ी जानी है। लेकिन चिंता का विषय यह है कि इसकी लाखों दुर्लभ किताबों और सरकारी अभिलेखों को शिफ्ट करने के लिए अभी तक कोई उपयुक्त जगह नहीं मिली है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: एक महत्वपूर्ण कदम

इस संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। 5 अक्टूबर को, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से लाइब्रेरी शिफ्ट करने के लिए प्रस्तावित जगह के बारे में तीन हफ्तों के भीतर जवाब मांगा। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने सरकार से नए सेंट्रल विस्टा प्लान में लाइब्रेरी के लिए कितनी जगह दी गई है, इसका लेआउट प्लान और पूरा ब्योरा हलफनामे में प्रस्तुत करने को कहा है। कोर्ट ने विशेष रूप से यह सवाल उठाया कि 1891 से चल रही इस लाइब्रेरी की लगभग 8.5 लाख किताबों और आरके पुरम में रखी 2 लाख अन्य किताबों के लिए क्या सिर्फ दो कमरे दिए जा रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता हरिप्रिया पद्मनाभन को एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) भी नियुक्त किया है।

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट और CSL का भविष्य

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट, नई दिल्ली में रायसीना हिल से इंडिया गेट तक के विशाल क्षेत्र के पुनर्विकास की एक महत्वाकांक्षी योजना है। इस प्रोजेक्ट के तहत, शास्त्री भवन, जहां CSL स्थित है, को तोड़कर कर्तव्य भवन 4 और 5 का निर्माण किया जाना है। इस प्रोजेक्ट की घोषणा 2019 में की गई थी, और सरकार को पहले से ही पता था कि किन संस्थाओं को नए प्रशासनिक केंद्र में जगह दी जाएगी। ऐसे में, इतनी महत्वपूर्ण और पुरानी लाइब्रेरी को बिना किसी ठोस योजना के कहीं और शिफ्ट करने का सवाल एक बड़ी चुनौती बन गया है।

एक सदी से भी पुरानी विरासत: सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी का इतिहास

CSL का इतिहास बहुत गहरा और समृद्ध है। इसे 1901 के इंपीरियल लाइब्रेरी एक्ट के तहत मान्यता मिली थी। इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी रेफरेंस लाइब्रेरी बनाना था, जो छात्रों के लिए पढ़ने का स्थान और भारत के भविष्य के इतिहासकारों के लिए ज्ञान का भंडार हो। इसका लक्ष्य था कि इसमें ‘भारत के बारे में किसी भी समय लिखी गई हर किताब को देखा और पढ़ा जा सके’।

स्थापना और शुरुआती विकास

  • संस्थापक: ब्रिटिश भारत के पहले इतिहासकार, शिक्षक और अभिलेखपाल एफ. डब्ल्यू. फॉरेस्टरवे को कोलकाता इंपीरियल डिपार्टमेंट का पहला क्यूरेटर नियुक्त किया गया था। उन्होंने ‘प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट, 1867’ के तहत लगभग एक हजार वॉल्यूम इकट्ठा किए।
  • इंपीरियल लाइब्रेरी का जन्म: इस संग्रह और कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में मौजूद अन्य सचिवालय पुस्तकालयों के अलग-अलग संग्रहों को मिलाकर 11 मई 1891 को ‘इंपीरियल लाइब्रेरी’ का उद्घाटन किया गया।
  • दुर्लभ संग्रह: इस लाइब्रेरी के संग्रह में ईस्ट इंडिया कॉलेज, फोर्ट विलियम कॉलेज और लंदन में ईस्ट इंडिया कंपनी बोर्ड की लाइब्रेरी की किताबें भी शामिल थीं।

राजधानी परिवर्तन और लाइब्रेरी का स्थानांतरण

1912 में जब राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट किया गया, तो ‘इंपीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी’ को भी दिल्ली लाया गया और इसे सिविल लाइन्स की पुरानी सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग में रखा गया। 1913 में इसके कुछ हिस्सों को शिमला सेक्रेटेरिएट भेज दिया गया। 10 फरवरी 1931 को नई दिल्ली में नए सेक्रेटेरिएट के उद्घाटन के साथ, लाइब्रेरी को नॉर्थ ब्लॉक में शिफ्ट किया गया और शिमला में चल रही सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी को भी इसमें मिला दिया गया।

किताबों को सुरक्षित रखना: एक बड़ा संघर्ष और चिंताएँ

CPWD (केंद्रीय लोक निर्माण विभाग) ने सभी मंत्रालयों को 30 सितंबर तक भवन खाली करने का समय दिया था। हालांकि, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय और CPWD अभी तक लाइब्रेरी के लिए कोई नई स्थायी जगह नहीं ढूंढ पाए हैं। कर्तव्य भवन-2 में 300 स्क्वायर मीटर के दो कमरों की जगह ऑफर की गई थी, जिसे लाइब्रेरी प्रशासन ने पर्याप्त न मानते हुए इनकार कर दिया।

CSL भारतीय राज्य के लिए एक ‘वर्किंग आर्काइव’ (कामकाजी संग्रह) के रूप में कार्य करती है, जो इसकी संस्थागत यादों, पिछली सरकारों के कार्यों और फैसलों का रिकॉर्ड रखती है। यह सरकार के अपने रिकॉर्ड रूम की तरह है। इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण आर्काइव को बिना किसी उचित सुरक्षा के यूंही छोड़ना बेहद चिंताजनक है।

अस्थायी बदलाव स्थायी क्यों हो सकता है? तुलसी सदन का उदाहरण

लाइब्रेरी को अस्थायी स्टोरेज में ले जाने के खतरे को ‘तुलसी सदन लाइब्रेरी’ के उदाहरण से समझा जा सकता है। CSL का क्षेत्रीय भाषाओं का यह सेक्शन, मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन के निर्माण के लिए 2011 में अस्थायी तौर पर बंद कर दिया गया था। इसके सामान को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के परिसर में रख दिया गया और यह लाइब्रेरी आज भी बंद है। बिना किसी फाइनल जगह के लाखों दुर्लभ दस्तावेजों को अस्थायी स्टोरेज में ले जाने से उनके खराब होने या खोने का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, जब कोई संग्रह स्टोरेज में होता है, तो अधिकारियों और शोधकर्ताओं की रिकॉर्ड्स तक पहुंच भी नहीं हो पाती है।

आगे की राह: महत्वपूर्ण सुझाव

इस ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व की लाइब्रेरी को बचाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं:

  • कैटलॉगिंग और क्लाइमेट-कंट्रोल्ड स्टोरेज: किसी भी इमारत को खाली करने से पहले, पुराने दस्तावेजों और दुर्लभ किताबों के लिए कैटलॉगिंग और जलवायु-नियंत्रित भंडारण की व्यवस्था करना अनिवार्य होना चाहिए।
  • डिजिटाइजेशन को प्राथमिकता: किसी भी जगह से सामान हटाने से पहले, दुर्लभ और नाजुक चीजों को डिजिटाइज किया जाना चाहिए ताकि उनकी डिजिटल कॉपी हमेशा सुरक्षित रहे।
  • तुलसी सदन को फिर से खोलें: तुलसी सदन लाइब्रेरी को फिर से खोलने के लिए एक समय-सीमा वाला प्लान बनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी को दूसरी जगह ले जाने का मामला यह दर्शाता है कि रीडेवलपमेंट के प्लान में उन संस्थानों के लिए नई इमारतें बनाने की योजना पहले से बना ली जानी चाहिए थी, जिन्हें उनमें आना था। शास्त्री भवन खाली होने से पहले लाइब्रेरी को पक्की और सुरक्षित जगह मिलती है या नहीं, यह बताएगा कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट अपनी पुरानी गलतियों को दोहराने से बचता है या नहीं। यह केवल एक लाइब्रेरी नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय विरासत का एक अमूल्य हिस्सा है, जिसका संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

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