भारतीय अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज: मनरेगा से RTI तक, भारत के सामाजिक विकास में अतुलनीय योगदान

भारतीय अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज: मनरेगा से RTI तक, भारत के सामाजिक विकास में अतुलनीय योगदान

हाल ही में दिल्ली में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के बाद भारतीय अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज एक बार फिर सुर्खियों में आए हैं। हालांकि, उनका परिचय केवल एक प्रदर्शनकारी के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक कल्याण नीतियों के एक प्रमुख शिल्पकार और गरीबों व वंचितों के अधिकारों के प्रबल समर्थक के रूप में है। बेल्जियम में जन्मे ज्यां द्रेज ने भारत को अपना घर बनाया और दशकों तक यहाँ की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों को समझने और उन्हें दूर करने के लिए काम किया।

कौन हैं ज्यां द्रेज?

ज्यां द्रेज का जन्म बेल्जियम में हुआ था, लेकिन 1979 से वे भारत में रह रहे हैं और 2002 से भारत के नागरिक हैं। उन्होंने अपनी शिक्षा बेल्जियम और यूनाइटेड किंगडम में पूरी की, लेकिन उनका शोध और जीवन का अधिकांश कार्य भारत की जमीनी हकीकत पर केंद्रित रहा है। भारत में गरीबी, भूख, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर उनका गहरा अध्ययन रहा है। वे ग्रामीण और गरीब परिवारों के जीवन पर सरकारी नीतियों के असर का विश्लेषण करते रहे हैं।

भारत की महत्वपूर्ण नीतियों के शिल्पकार

1990 के दशक से ज्यां द्रेज ने कई सामाजिक कल्याण पहलों पर काम किया है और सरकारी कार्यक्रमों पर महत्वपूर्ण चर्चाओं में योगदान दिया है। उनके उल्लेखनीय कार्यों में निम्नलिखित नीतियां शामिल हैं:

  • राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) 2005: जिसे अब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA/मनरेगा) के नाम से जाना जाता है, इसके मूल विचार को आकार देने वाले प्रमुख अर्थशास्त्रियों में द्रेज शामिल हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ग्रामीण लोगों के लिए रोजगार केवल सरकारी सहायता नहीं, बल्कि कानून से मिला अधिकार होना चाहिए। मनरेगा ने पात्र ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिन तक अकुशल मजदूरी वाले काम की गारंटी दी, जिससे मजदूरों, विशेषकर महिलाओं और कमजोर वर्गों को रोजगार मांगने की ताकत मिली।
  • सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम: द्रेज ने RTI अधिनियम के क्रियान्वयन से जुड़े विमर्श में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जोर इस बात पर रहा है कि लोगों को सिर्फ योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि अपने अधिकारों का दावा करने वाला जागरूक नागरिक माना जाए।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (मिड-डे मील योजना सहित): भारत में भूख, कुपोषण और गरीब परिवारों तक खाना पहुंचाने की सरकारी व्यवस्था पर उनके शोध ने खाद्य सुरक्षा से जुड़े कानूनों और नीतियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मिड-डे मील योजना बच्चों को स्कूल में पौष्टिक भोजन प्रदान कर शिक्षा और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम था।

शिक्षा और स्वास्थ्य के पैरोकार

ज्यां द्रेज ने सरकारी स्कूलों, प्राथमिक शिक्षा, बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण पर विशेष रूप से काम किया है। वे इस बात पर जोर देते रहे हैं कि बच्चों को स्कूल, भोजन और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना सामाजिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। उनका मानना है कि इन बुनियादी जरूरतों को पूरा किए बिना कोई भी समाज वास्तव में प्रगति नहीं कर सकता।

नीतियों पर एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण

द्रेज सिर्फ नीतियों के समर्थक ही नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन और संभावित कमियों पर एक आलोचनात्मक नजर भी रखते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने VB-G RAM G कानून को लेकर चिंता जताई थी। उनका मानना था कि तय बजट और केंद्र सरकार के अधिक नियंत्रण से रोजगार की मांग पर आधारित पुरानी व्यवस्था कमजोर हो सकती है, जिससे ग्रामीण गरीबों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

वैश्विक सम्मान और अकादमिक योगदान

ज्यां द्रेज के कार्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है। उन्हें ‘ग्लोबल इनइक्वालिटी रिसर्च अवार्ड’ (GiRA) से सम्मानित किया गया है। वे अर्थशास्त्र विभाग में योजना और विकास इकाई में मानद चेयर प्रोफेसर भी रह चुके हैं, जिसे भारत सरकार के योजना आयोग द्वारा स्थापित किया गया था।

उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं, जिनमें ‘अमर्त्य हंगर एंड पब्लिक एक्शन’ (1989), ‘इंडिया: डेवलपमेंट एंड पार्टीसिपेशन’ (2002) और ‘एन अनसर्टन ग्लोरी; इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन’ (2013) शामिल हैं। उन्होंने ब्रिटिश अर्थशास्त्री निकोलस स्टर्न और नोबेल पुरस्कार विजेता एंगस डीटन के साथ भी काम किया है। उनकी अपनी पुस्तक ‘सेंस एंड सॉलिडेरिटी: झोलवाला इकोनॉमिक्स फॉर एवरीवन’ (2019) भी काफी चर्चित रही है।

अर्थशास्त्र से परे एक कार्यकर्ता का जीवन

द्रेज का जीवन केवल अकादमिक शोध तक ही सीमित नहीं रहा। अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई के दौरान वे लंदन में बेघर लोगों के साथ रहे और उन्हें एक आंदोलन शुरू करने में मदद की, जिसका अनुभव उन्होंने ‘नंबर 1 क्लैफम रोड: द डायरी ऑफ अ स्क्वैट’ नामक किताब में लिखा। वे शांति अभियानों में भी शामिल रहे हैं; 1990-91 के इराक युद्ध के दौरान वे इराक-कुवैत बॉर्डर पर एक शांति कैंप में शामिल हुए थे। इसके बाद उन्होंने ‘हंगर एंड पॉवर्टी इन इराक, 1991’ लिखी, जिसमें गल्फ वॉर के बाद देश की आर्थिक स्थितियों का विश्लेषण किया गया था।

ज्यां द्रेज का काम भूख, जेंडर असमानता, बच्चों की सेहत और शिक्षा जैसे मूलभूत मुद्दों पर केंद्रित रहा है, जिससे सार्वजनिक नीति पर चर्चा में गरीबी और सामाजिक कल्याण के सवालों को हमेशा प्राथमिकता मिली है।

निष्कर्ष

ज्यां द्रेज एक ऐसे अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने सिर्फ सिद्धांतों पर काम नहीं किया, बल्कि जमीन पर उतरकर लोगों के जीवन को बेहतर बनाने वाली नीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन और कार्य भारत में सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण है।

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