NEET UG काउंसलिंग के बाद भी क्यों खाली रह गईं सैकड़ों MBBS सीटें? जानें क्या है असली वजह

NEET UG 2026 काउंसलिंग और खाली सीटों का सच

हाल ही में NEET UG 2026 काउंसलिंग की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, स्ट्रे वैकेंसी राउंड (आखरी काउंसलिंग) के बाद भी देश के कई राज्यों में एमबीबीएस की सैकड़ों सीटें खाली रह गई हैं। खासतौर पर तमिलनाडु, पुडुचेरी और कर्नाटक में 800 से ज्यादा सीटें खाली पाई गई हैं, जिन पर किसी भी छात्र ने एडमिशन नहीं लिया है। इन खाली सीटों में से लगभग 98% सीटें अकेले तमिलनाडु और पुडुचेरी की डीम्ड यूनिवर्सिटीज से संबंधित हैं।

11 लाख से अधिक छात्रों के क्वालीफाई करने के बावजूद सीटें खाली क्यों?

यह एक बड़ा सवाल है कि जब इस साल 11,21,000 से अधिक उम्मीदवारों ने NEET UG परीक्षा क्वालीफाई की है, तब भी इतनी बड़ी संख्या में सीटें खाली क्यों रह गई हैं? इसके अलावा, BAMS, BHMS, BUMS और BVSc जैसे आयुष कोर्सेज की लगभग 52,000 से अधिक सीटें भी नीट स्कोर के जरिए भरी जाती हैं।

शैक्षणिक विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी भारी संख्या में छात्रों के पास होने के बाद भी सीटें खाली रहने की मुख्य वजह मेडिकल शिक्षा की भारी-भरकम फीस है। छात्रों में एमबीबीएस करने की इच्छा की कोई कमी नहीं है, लेकिन प्राइवेट और डीम्ड कॉलेजों का खर्च इतना अधिक है कि आम परिवार इसे उठाने में असमर्थ हैं।

महंगी फीस बना मेडिकल एडमिशन में सबसे बड़ी बाधा

विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार नीट परीक्षा में अच्छा स्कोर करने वाले छात्र भी काउंसलिंग प्रक्रिया से खुद को दूर कर लेते हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • अत्यधिक ट्यूशन फीस: तमिलनाडु और पुडुचेरी की डीम्ड यूनिवर्सिटीज में एमबीबीएस की एक साल की ट्यूशन फीस 21 लाख से 35 लाख रुपए तक है।
  • रहने-खाने का अतिरिक्त खर्च (Hostel & Mess): ट्यूशन फीस के अलावा हॉस्टल और मेस का खर्च सालाना 1.2 लाख से 2.5 लाख रुपए तक अलग से देना होता है।
  • अन्य प्राइवेट कॉलेजों का हाल: देश के बाकी हिस्सों में भी प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की सालाना फीस औसतन 17 से 18 लाख रुपए तक है।

विशेषज्ञों की राय और शिक्षा प्रणाली पर सवाल

शैक्षणिक एक्सपर्ट कुणाल सिंह का कहना है कि जरूरी नहीं कि नीट-यूजी टॉप करने वाला हर छात्र एमबीबीएस कर सके। सरकारी कॉलेजों में सीटें बेहद सीमित हैं और प्राइवेट कॉलेजों की फीस आम आदमी के बजट से बाहर है। यही वजह है कि छात्र मजबूरन काउंसलिंग में अप्लाई नहीं करते और पीछे हट जाते हैं।

‘स्टेट प्लेटफॉर्म फॉर कॉमन स्कूल सिस्टम, तमिलनाडु’ के महासचिव ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कम स्कोर वाले आर्थिक रूप से मजबूत छात्र आसानी से सीटें हासिल कर लेते हैं। उनका मानना है कि यदि कॉलेज अपनी फीस कम करने में असमर्थ हैं, तो उन्हें बंद कर दिया जाना चाहिए और सरकारों को अधिक से अधिक नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोलने चाहिए।

क्या MCC आयोजित करेगा कोई स्पेशल काउंसलिंग राउंड?

मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) ने स्ट्रे वैकेंसी यानी फाइनल राउंड का रिजल्ट पहले ही जारी कर दिया है। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने के बाद शिक्षा जगत में यह चर्चा है कि क्या एमसीसी कोई स्पेशल काउंसलिंग राउंड आयोजित करेगा या नहीं। फिलहाल, MCC की तरफ से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

निष्कर्ष

NEET UG काउंसलिंग के बाद खाली रहने वाली ये सीटें इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि देश में मेडिकल एजुकेशन अब आम छात्रों की पहुंच से दूर होती जा रही है। जब तक सरकारें प्राइवेट सेक्टर की फीस पर नियंत्रण नहीं रखतीं या सरकारी मेडिकल सीटों का दायरा नहीं बढ़ातीं, तब तक मेधावी छात्रों के लिए डॉक्टर बनने का सपना अधूरा ही रह जाएगा।

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